Thu Oct 31 10:32:32 UTC 2024: ## सरदार पटेल: मुस्लिम विरोधी या सच्चा देशभक्त?
सरदार वल्लभभाई पटेल, भारत के लौह पुरुष, उनके जीवनकाल में ही साम्प्रदायिक और हिंदू समर्थक होने के आरोपों का सामना करते रहे थे। मुस्लिम समुदाय के प्रति उनकी सोच पर आज भी सवाल उठते हैं। लेकिन महात्मा गांधी ने सरदार को मुस्लिम विरोधी कहना सच्चाई का उपहास उड़ाना बताया था। उनके अनुसार, सरदार के दिल में सभी के लिए जगह थी।
हालांकि, सरदार हमेशा दो टूक बोलने वाले थे। एक भाषण में उन्होंने कहा था कि भारत में एक ही राष्ट्रवादी मुस्लमान है – पंडित नेहरू। इस बयान ने तेजी से फैलकर महात्मा गांधी को भी चिंता में डाल दिया। उन्होंने सरदार को विवेक पर हाजिरजवाबी का हावी न होने देने की नसीहत दी।
सरदार की हिंदू-मुस्लिम रिश्तों को लेकर सोच बहुत स्पष्ट थी। उन्हें विभाजन स्वीकार नहीं था, लेकिन मजबूरी में उन्हें इसे स्वीकार करना पड़ा। 1931 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने मुस्लमानों को आश्वस्त करते हुए कहा था कि वह अल्पसंख्यकों की मांगों को सुनेंगे। लेकिन विभाजन के बाद मुस्लिम लीग की बढ़ती आक्रामकता और मुस्लिम समुदाय का जिन्ना की ओर झुकाव, सरदार को चिंता में डाल रहा था।
सरदार जिन्ना के नेतृत्व को लेकर निराश थे और उन्हें लगता था कि जिन्ना मुसलमानों को गलत रास्ते पर ले जा रहे हैं। यरवदा जेल में उन्होंने महात्मा गांधी से पूछा था कि कौन से मुसलमान उनकी बात सुनते हैं। गांधी का जवाब था, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक भी मुसलमान मुझ पर भरोसा न करे, लेकिन हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। एक दिन वे सच्चाई समझेंगे।”
सरदार को लगता था कि लीग को समझाने का कोई फायदा नहीं है और उनका मुकाबला किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा था, “सड़सठ साल बीत चुके, अब यह मिट्टी का घड़ा टूटने वाला है। बहुत देर हो चुकी उर्दू सीखने में। फिर भी मैं कोशिश करूंगा, लेकिन आपके उर्दू सीखने का कोई लाभ नहीं हुआ। आप जितना ही उनके नजदीक जाने की कोशिश करते हैं, वे उतना ही दूर होते जाते हैं।”
विभाजन के दौरान सरदार के रुख पर सवाल उठे थे। हालांकि, उनके जीवनीकार राजमोहन गांधी के अनुसार, सरदार ने हिंदू, सिख दंगाइयों को बख्शा नहीं। उन्हें मुस्लिम लीग से घृणा थी लेकिन वे दो राष्ट्रों के सिद्धांत के खिलाफ थे। उन्होंने कहा था, “भारत में सात करोड़ मुसलमान हैं और वे सुरक्षित और स्वतंत्र रहें, यह देखना हमारा काम है।”
16 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की बैठक में सरदार ने दोनों देशों में हो रहे पलायन को देखते हुए आबादी के सुनियोजित स्थानांतरण का सुझाव दिया था।
6 जनवरी 1948 को लखनऊ में दिए अपने भाषण में सरदार ने कहा था, “मैं मुसलमानों का सच्चा दोस्त हूं। फिर भी मुझे उनका सबसे बड़ा दुश्मन बताया जाता है। मैं आप लोगों से कह देना चाहता हूं कि इस नाजुक घड़ी में भारतीय संघ से निष्ठा की घोषणा मात्र पर्याप्त नहीं है। आपको इसे प्रमाणित करना होगा। इसी लखनऊ में दो राष्ट्रों के सिद्धान्त की नींव रखी गई। इस सिद्धांत को फैलाने में शहर के मुसलमानों का भी योगदान रहा है। एक सवाल मैं पूछना चाहता हूं। हाल ही में मुस्लिम कांफ्रेस में कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले पर कुछ क्यों नही बोला गया? मैं दो टूक बता देना चाहता हूं। आप दो घोड़ों की सवारी नही कर सकते। जो घोड़ा आपको पसंद हो चुन लें। एक ही नाव में रहना और साथ-साथ तैरना या डूबना सीखना होगा.”
इस भाषण का व्यापक प्रचार हुआ और सरदार की साफगोई की तारीफ हुई, लेकिन मुस्लिम समुदाय में असंतोष के स्वर भी उठे। महात्मा गांधी ने उन्हें लिखा, “मुझे आपके खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं। आपके भाषण उत्तेजना फैलाने और भावनाओं को भड़काने वाले है। आप लोगों को तलवार का मुकाबला तलवार से करने की शिक्षा दे रहे हैं। अगर ये सच है तो इससे बहुत नुकसान होगा।”
सरदार पटेल एक मजबूत व्यक्तित्व थे, जिनकी राय और कार्य हमेशा चर्चा का विषय रहे। मुस्लिम समुदाय के प्रति उनकी सोच और कार्य सदा विवादों में घिरे रहे, लेकिन उनकी देशभक्ति और भारत के प्रति निष्ठा पर किसी को भी संदेह नहीं है।