Wed Sep 25 05:55:04 UTC 2024: ## माताएं संतान के लिए रखती हैं जितिया व्रत: जानें चील-सियार की कथा

**नई दिल्ली:** जितिया व्रत, जो पूर्वी भारत के कई हिस्सों में मनाया जाता है, संतान के सुख और लंबी आयु के लिए माना जाने वाला एक कठिन व्रत है. इस व्रत में महिलाएं अन्न-जल तक ग्रहण नहीं करती हैं. इस साल जितिया व्रत 25 सितंबर, 2024 को है और 26 सितंबर को इसका पारण होगा.

जितिया व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि से शुरू होकर नवमी तक, तीन दिनों तक चलता है. इस व्रत में महिलाएं जीमूतवाहन देवता की पूजा करती हैं, जो कि कुशा से निर्मित होता है. कुछ जगहों पर गोबर और मिट्टी से सियारिन और चील की प्रतिमा भी बनाई जाती है.

इस व्रत से जुड़ी तीन कथाएं हैं, जिनमें सबसे लोकप्रिय है चील-सियार की कथा.

कथा के अनुसार, नर्मदा नदी के पास हिमालय के जंगल में एक चील और एक सियार रहा करते थे. दोनों ने कुछ महिलाओं को जितिया व्रत करते हुए देखा और खुद भी यह व्रत करने का फैसला किया. लेकिन उपवास के दौरान सियार को बहुत भूख लगी और उसने चुपके से एक मरे हुए जानवर को खा लिया. चील ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया. दूसरी ओर, चील ने पूरे श्रद्धा और समर्पण भाव से जितिया का व्रत किया.

समय के साथ, दोनों की मृत्यु हुई और उनका दूसरा जन्म मनुष्य रूप में हुआ. वे एक ही घर में बहनें बनीं. बड़ी बहन का नाम कर्पूरावती और छोटी का शिलावती था. दोनों का विवाह हुआ और सात-सात पुत्र हुए. लेकिन कर्पूरावती के सभी पुत्र जन्म के कुछ दिन बाद ही मर गए जबकि शिलावती के सातों पुत्र जीवित रहे.

कर्पूरावती को शिलावती से जलन होने लगी और उसने अपनी छोटी बहन के बच्चों को मारने के कई बार प्रयास किए लेकिन वह सफल नहीं हुई. अंत में, उसने राजा से शिलावती के बच्चों के सिर लाने की शर्त रखी. राजा को उसकी बात माननी पड़ी और उसने चांडाल को यह काम सौंपा.

शिलावती ने उस दिन जितिया का व्रत रखा था. जब उसने व्रत खोला तो देखा कि कर्पूरावती के घर से कुछ संदेश आया है. कपड़े हटाने पर उसे नारियल, कपड़े और फल मिले. जितिया व्रत के प्रभाव से, शिलावती के बच्चों के मंडा हुए सिर नारियल में बदल गए थे.

कर्पूरावती को पता चला कि उसके सभी पुत्र जीवित हैं. उसने अपनी छोटी बहन से यह सब पूछा तो शिलावती ने बताया कि पिछले जन्म में वह चील थी और उसने नियमों का पालन करते हुए जितिया का व्रत किया था. इसके विपरीत, कर्पूरावती पिछले जन्म में सियार थी और उसने मांस खाया था.

इस घटना के बाद, कर्पूरावती ने भी जितिया का व्रत किया और उसे भी संतान सुख प्राप्त हुआ.

यह कथा जितिया व्रत की महिमा और महत्व को दर्शाती है.

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